वोह बुलंदिआ भी क्या बुलंदियां हैं
जिन पर चढ़ कर गुरूर ना हो
वोह दूरियाँ भी क्या दूरियां हैं
जहां आदान की आवाज़ सुनाई देती है
वह दरिया भी क्या कोई दरिया है
जिसका साहिल दूर कश्ती से आवाज़ें मारता हो
वह जनत भी क्या जनत है
जहां पहुँचने की कीमत ज़िन्दगी हो
कभी इंदर से पूछना अगर रास्ता खो जाओ
उसने हर राह से वास्ता पाला है
मानना या न मानना उसकी बात
पर एक बार रुक कर सुनते चलना
उस मयखाने से फासला बना के रखना
जहां से कुछ लड़खड़ाते पैर न निकलते हो
कुछ उन लोगों से मुंसिफ रहना
जो भीड़ को अपने साथ ले चलते हों
वो परछाई भी जालसाज़ है
जो अँधेरे की पहली करवट पर सिरा बदलती हो
पर अगर किसी की धुन पर नाचने का दिल करे
तोह पैरों की ज़ंजीरें तोड़ते चलना

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